बचपन की निश्छल अल्हरता को, को कभी झुँझलाहट बनते देखा ! जो खुल के भी कभी रोते थे, उसे चुप हो के सिसकते देखा ! किसी आँगन में जो खेला करती, उन खाली पाँवों में पायल को बँधते देखा ! उस दुपहर में जिद कर कितनी कभी उस आँचल में सिर रख सोती ! आज […]